औषधीय प्रजाति के कई पौधे जिले के काश्तकारों को अच्छा रोजगार दे रहे हैं।



लाकडाउन काल में घर लौटे कई प्रवासी इन दिनों आंवला और तेजपात बेचकर रसोई का खर्च निकाल रहे हैं। आंवला 60 से 80 रुपया किलो तो तेजपात 180 से 200 रुपये किलो बेचा जा रहा है।

आंवला और तेजपात की पैदावार जिले के घाटी वाले क्षेत्रों में बहुतायत में होती है। चम्पावत के मंच तामली क्षेत्र, सूखीढांग, बनलेख, लोहाघाट के पंचेश्वर, पुल्ला, बाराकोट के गल्लागांव, तड़ीगांव, नौमाना व पाटी के भिंगराड़ा क्षेत्र में बड़ी मात्रा में आंवला पैदा होता है। इन इलाकों में तेजपात की खेती भी होती है। बड़े काश्तकार तेजपात को भेषज संघ के माध्यम से तो छोटे काश्तकार डिमांड के आधार पर किलो के भाव बेचते हैं। इस बार आंवला और तेजपात सब्जी व किराना की दुकान में भी मिल रहा है। अधिकांश प्रवासियों ने इसे सीजनल रोजगार का साधन बना लिया है। तेजपात और आंवले की खेती करने वाले काश्तकार धन सिंह, पार्वती देवी, तुलाराम जोशी, महेश चंद्र चौथिया, प्रकाश चंद्र तलनियां ने बताया कि पिछले वर्षो तक उनका माल समय पर बाजार नहीं पहुंच पाता था लेकिन इस बार लाकडाउन में घर लौटे उनके बच्चे आंवला और तेजपात को बाजार के अलावा गांवों में जाकर बेच रहे हैं। पंजाब से लौटे प्रवासी जगत प्रकाश, राजेंद्र ओली, मनीष भट्ट, दिल्ली से लौटे हरीश प्रसाद, तुलाराम, महेंद्र सिंह ने बताया कि लोग फलों की गुणवत्ता को देखकर 60 से 80 रुपये किलो तक आंवला खुशी-खुशी खरीद रहे हैं। तेजपात भी 180 से 200 रुपये किलो तक बेच रहे हैं। चम्पावत के प्रवासी देवेंद्र सिंह, कैलाश मनराल, विवेक सिंह, बाराकोट के ईजड़ा गांव निवासी अखिलेश कुमार, सुभाष चंद्र आदि ने बताया कि इस सीजन में उन्होंने आंवला, तेजपात, हरड़, बड़ी इलायची, नीम आदि पौधों का रोपण किया है।

इधर मां बाराही जिला स्वायत्त सहकारिता समिति जिले में तेजपात, बड़ी इलायची, आंवला आदि औषधीय पौधों को बढ़ावा देने के लिए जीबी पंत हिमालयी पर्यावरण एवं विकास संस्थान अल्मोड़ा का सहयोग लेगी। समिति के अध्यक्ष रमेश चंद्र पंत ने बताया कि अनुसंधान संस्थान से बड़े पैमाने पर औषधीय पौधे मंगवाकर उसे काश्तकारों को उपलब्ध कराया जाएगा। प्रोत्साहन मिले तो बढ़ सकता है जड़ी-बूटी का उत्पादन

चम्पावत : जिले के प्रमुख जड़ी बूटी उत्पादक काश्तकार किशन सिंह फत्र्याल का कहना है कि काश्तकारों को प्रोत्साहन दिया जाए तो जिले में जड़ी-बूटी उत्पादन बढ़ सकता है। इससे रोजगार के साधन भी मजबूत होंगे। औषधीय पौधों की खेती करने का प्रशिक्षण और उनके उत्पाद तैयार करने की जानकारी काश्तकारों को दी जानी आवश्यक है। भेषज संघ को अधिक से अधिक किसानों का पंजीकरण कर उन्हें लाइसेंस देना चाहिए। नियोजित तरीके से खेती कर उसका नियोजित विपणन जरूरी है ताकि काश्तकारों को बिचौलियों से बचाया जा सके। प्रवासियों द्वारा कृषि कार्य से जुड़कर रोजगार अपनाने की खबरें काफी संतोषजनक हैं। औषधीय पौधों की खेती, उसका संरक्षण, विपणन उचित तरीके से हो इसके लिए शीघ्र जिला भेषज संघ की बैठक लेकर आवश्यक दिशा निर्देश दिए जाएंगे। ऐसे काश्तकारों को सरकारी योजना से भी लाभांवित किया जाएगा।
-आरएस रावत, सीडीओ, चम्पावत


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