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वन विभाग के नए अध्ययन ने खोला जंगलों में आग का राज, चीड़ बना सबसे बड़ा फायर हॉटस्पॉट, मिश्रित वन पर भी संकट

उत्तराखंड वन विभाग की जंगल की आग पर नई स्टडी में पाया गया कि चीड़ के जंगल सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. रिपोर्ट- नवीन उनियाल

देहरादून: उत्तराखंड में 2026 की वनाग्नि के आंकड़ों ने जंगलों की संवेदनशीलता का राज खोला है. वनाग्नि की 580 घटनाओं में 500.81 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ. सबसे ज्यादा नुकसान चीड़ के जंगलों को हुआ, जहां 52.36 प्रतिशत क्षेत्र प्रभावित है. मिश्रित वन भी 30.49 प्रतिशत नुकसान के साथ आग की बड़ी चपेट में हैं.

उत्तराखंड में साल 2026 के वनाग्नि के आंकड़े जंगलों की बदलती संवेदनशीलता और आग के फैलते स्वरूप की चिंताजनक तस्वीर सामने ला रहे हैं. वन विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, फॉरेस्ट फायर सीजन यानी 15 फरवरी से 15 जून तक वनाग्नि की कुल 580 घटनाओं में 500.81 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है. आंकड़ों का प्रजातिवार विश्लेषण बताता है कि, आग का सबसे बड़ा दबाव चीड़ के जंगलों पर है, लेकिन खतरा केवल चीड़ तक सीमित नहीं है. मिश्रित वन, साल के जंगल और अन्य वन क्षेत्र भी आग की चपेट में आ रहे हैं. यही वजह है कि वनाग्नि को अब किसी एक प्रजाति या क्षेत्र तक सीमित समस्या मानना वन प्रबंधन के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है.

चीड़ के जंगल आग से सबसे ज्यादा प्रभावित: आंकड़ों में सबसे चिंताजनक स्थिति चीड़ के जंगलों की सामने आई है. साल 2026 में चीड़ क्षेत्र में 323 वनाग्नि घटनाएं दर्ज की गईं और इससे 262.23 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ. यह कुल प्रभावित वन क्षेत्र का 52.36 प्रतिशत है. यानी आग से प्रभावित कुल क्षेत्र में आधे से अधिक हिस्सा अकेले चीड़ के जंगलों का है. वनाग्नि की कुल घटनाओं में भी चीड़ क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 56 प्रतिशत बैठती है.आग के लिए ईंधन का काम करता पिरूल: चीड़ के जंगलों में आग के लिहाज से सबसे बड़ी चुनौती जमीन पर जमा होने वाली सूखी चीड़ की पत्तियां यानी पिरूल है. गर्म और शुष्क मौसम में यह सूखी जैविक सामग्री आग के लिए ईंधन का काम करती है. तेज हवा चलने पर आग एक हिस्से से दूसरे हिस्से में तेजी से फैल सकती है. यही कारण है कि चीड़ के जंगलों में आग की घटनाओं की संख्या और प्रभावित क्षेत्र दोनों ही अन्य कई वन प्रजातियों की तुलना में अधिक दिखाई दे रहे हैं.मिश्रित वन भी दूसरी बड़ी चिंता: वनाग्नि के आंकड़ों का दूसरा बड़ा संकेत मिश्रित वनों को लेकर है. इन क्षेत्रों में 168 आग की घटनाओं में 152.71 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ. यह कुल प्रभावित क्षेत्र का 30.49 प्रतिशत है. इसका मतलब है कि चीड़ के बाद आग से होने वाले नुकसान में मिश्रित वन दूसरे स्थान पर हैं.

मिश्रित वन क्षेत्र पर भी खतरा: मिश्रित वनों की स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां अलग-अलग प्रजातियों के पेड़-पौधे, झाड़ियां और सूखी वनस्पति एक साथ मौजूद होती हैं. लंबे समय तक बारिश नहीं होने, जमीन पर सूखी पत्तियों की परत जमा होने और तापमान बढ़ने की स्थिति में यह वन क्षेत्र भी आग के तेजी से फैलने के लिए संवेदनशील हो सकते हैं. ऐसे में केवल चीड़ क्षेत्रों पर फोकस करने के बजाय मिश्रित वनों में भी फायर लाइन, निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी होगा.

साल के जंगलों में भी पहुंची आग: आंकड़ों में साल के जंगल भी वनाग्नि से अछूते नहीं हैं. साल क्षेत्र में 31 आग की घटनाएं दर्ज हुईं और 45.6 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ. कुल प्रभावित क्षेत्र में साल की हिस्सेदारी 9.11 प्रतिशत है. घटनाओं की संख्या चीड़ और मिश्रित वनों की तुलना में कम जरूर है, लेकिन प्रभावित क्षेत्र को देखें तो साल के जंगलों में आग की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

यह आंकड़ा इस ओर भी संकेत करता है कि वनाग्नि की समस्या केवल पहाड़ी चीड़ क्षेत्रों तक सीमित नहीं है. प्रदेश के अलग-अलग वन प्रकारों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आग का खतरा मौजूद है. ऐसे में वनाग्नि प्रबंधन के लिए प्रजातिवार और क्षेत्रवार रणनीति तैयार करना महत्वपूर्ण हो जाता है.

बांज के जंगलों में घटनाएं कम, लेकिन संरक्षण की चुनौती बढ़ी: बांज के जंगलों में इस साल 9 वनाग्नि घटनाएं दर्ज हुईं और 5.37 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ. कुल प्रभावित क्षेत्र में इसकी हिस्सेदारी 1.07 प्रतिशत है. आंकड़ों के लिहाज से बांज वन सबसे कम प्रभावित दिखाई दे रहे हैं, लेकिन पारिस्थितिक दृष्टि से इन जंगलों का महत्व काफी अधिक है.

बांज जैसे चौड़ी पत्ती वाले वन जल संरक्षण, मिट्टी संरक्षण और स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं. इसलिए अपेक्षाकृत कम क्षेत्र प्रभावित होने के बावजूद इन जंगलों में आग की प्रत्येक घटना को गंभीरता से देखना जरूरी है. बांज के जंगलों को आग से बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर निगरानी और सामुदायिक भागीदारी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

बंजर और रिक्त इकाइयों में भी 32 घटनाएं: आंकड़ों में बंजर/रिक्त वन इकाइयों में भी 32 वनाग्नि घटनाएं दर्ज हुई हैं. यहां 24.65 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ, जो कुल प्रभावित क्षेत्र का 4.92 प्रतिशत है. वहीं अन्य श्रेणी के वनों में जैसे सागौन, फलदार समेत अन्य वन क्षेत्रों में 17 घटनाओं से 9.80 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ और इसकी हिस्सेदारी 2.05 प्रतिशत रही.

इन आंकड़ों को जोड़कर देखें तो वनाग्नि का स्वरूप केवल किसी एक प्रजाति के जंगलों तक सीमित नहीं है. प्रदेश में अलग-अलग प्रकार के वन क्षेत्र आग की चपेट में आ रहे हैं. यह स्थिति वन विभाग के लिए एक व्यापक और बहुस्तरीय फायर मैनेजमेंट रणनीति की जरूरत को रेखांकित करती है.

आंकड़े दे रहे हैं बड़े खतरे का संकेत: कुल 580 घटनाओं और 500.81 हेक्टेयर प्रभावित क्षेत्र के आंकड़े भले ही पिछले वर्षों की तुलना में वनाग्नि की पूरी तस्वीर न बताते हों, लेकिन प्रजातिवार विश्लेषण एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर देता है. चीड़ और मिश्रित वन मिलकर कुल प्रभावित क्षेत्र का 82.85 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं. यानी आग से हुए कुल नुकसान में इन दोनों वन प्रकारों की हिस्सेदारी बेहद बड़ी है.

हालांकि, केवल चीड़ को वनाग्नि की वजह मानना भी तस्वीर को अधूरा कर सकता है. आग लगने के पीछे मानवीय गतिविधियां, जंगलों में सूखी जैविक सामग्री का जमा होना, लंबे समय तक बारिश का न होना, बढ़ता तापमान, तेज हवाएं और जंगलों के आसपास बढ़ता मानवीय दबाव जैसे कई कारक भूमिका निभा सकते हैं. चीड़ के जंगलों में पिरूल आग को फैलने के लिए ईंधन उपलब्ध कराता है, जबकि मिश्रित और अन्य वन क्षेत्रों में सूखी पत्तियां और वनस्पति आग के प्रसार को बढ़ा सकती हैं.

महकमे के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीड़ के जंगल हैं, जहां पर सबसे ज्यादा आग लगने की घटना हो रही है. यह पहला मौका है जब विभाग ने विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है जिससे यह पता चल पा रहा है कि किन-किन जंगलों में आग की घटनाओं की क्या स्थिति रही है, और इसी आधार पर भविष्य में इस पर काम किया जा सकता है.
-सुशांत पटनायक, CCF वनाग्नि-

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